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Home युग व्यामोह युग व्यामोह सुरेश चन्द्र मिश्र ‘विमुक्त’ अध्यापक, रामाधीन सिंह कालेज, बाबूगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
By Law Logic Learner July 15, 2025 0
सत्यं शिवं सुन्दरम्
ऊँ श्री बृहस्पतये नमः
ऊँ श्री गणेशाय नमः
अयं निजः परो वेति, गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु, वसुधैव कुटुम्बकम्।।
-ः युग व्यामोह:-
सर्वे भवन्तु सुखिनो, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुःखभाक्भवेत।।
सुरेश चन्द्र मिश्र ‘विमुक्त’
अध्यापक, रामाधीन सिंह कालेज,
बाबूगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
पृथ्वी माता की जय हो।
भारत माता की जय हो।
समस्त देवों की जय हो।
___________________________________________________________________________________
-ः समर्पण:-
-ः भूमिका:-
आज समग्र विश्व को भेड़ों की तरह अन्धानुकरण करता हुआ देखकर मन आक्रोश से भर उठा है। नाश की ओर निरंतर बढ़ने पर भी, सब उसी पथ पर अग्रसर हैं। बेसुध! बेफिक्र! तन बदन का होश खोकर, भौतिकवाद रूपी दैत्य के मुख में प्रविष्ट होने के लिए उत्सुक मानव, अपनी बुद्धि खो बैठा है। कहा भी है:-
ऐसी स्थिति में, जबकि समग्र विश्व भ्रष्ट हो चुका है, उसका नाश होना स्वाभाविक सा लग रहा है। मजे की बात तो यह है कि सभी की बुद्धि व्यामोह में ऐसी खो गई है कि उसे हित की बात अमंगलकारिणी प्रतीत होती है। महाभारत युद्ध के समय में व्यासदेव ने द्रोणाचार्च पुत्र अश्वत्थामा एवं गाण्डीवधारी अर्जुन को सम्बोधित करके कहा था ‘‘तुम दोनों ही महान वीर हो। बुद्धि से काम लो। तुम दोनों ही के पास पाशुपतास्त्र हैं। इनका प्रयोग किसी भी दशा में ठीक नहीं। अगर तुम इनका प्रयोग करते हो तो सारी पृथ्वी पर चैदह वर्ष तक अन्न की उत्पत्ति सम्भव नहीं फलतः समस्त पृथ्वी प्राणि मात्र से शून्य हो जायेगी। महायन्त्रों का प्रयोग, मानव कल्याण नहीं कर सकता।’’
आज, पुनः समग्र विश्व में वही स्थिति प्रस्तुत हो चुकी है। इसलिये व्यासदेव के उस उपदेश को जानना जनहित के लिये आवश्यक हो गया है। यन्त्रवाद के प्रति अनुचित मोह का त्याग शीघ्र ही करना होगा अन्यथा शंकर का ताण्डव नृत्य होकर रहेगा, वह बच नहीं सकता। फलतः प्रलयकारी दृश्य उपस्थित होने में अब देर नहीं। अगर जन मंगल करना हमारा लक्ष्य शीघ्र ही नहीं बन जाता तो निश्चित ही हम उस स्थिति से बच न पायेंगे, जिससे बचना जनहित के लिय आवश्यक है।
प्रस्तुत ‘युग-व्यामोह’ नामक काव्य में मैंने भौतिकवाद के विभिन्न रूपों का विषद चित्रण किया है। भौतिकवाद के रूप हैं:- यन्त्रवाद, वर्गवाद, काम, क्रोध, लोभ तथा मोह। इन्हीं रूपों को धारण करके, आज, भौतिकवाद पुनः समग्र मानवता का नाश करने के लिये सन्नद्ध हो उठा है।
सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक कई बार इस वाद ने मानव को मूर्ख बनाया और उसका नाश किया। जितनी भी बुरी चीजें होती हैं उनकी ओर हमारा मन अवश्य ही शीघ्र आकर्षित हो जाता है। हम पुनः भौतिकवादी चमचमाहट की चकाचैंध से चकित होकर, उसके पीछे आंख मीच कर चल पड़े हैं। अगर हम शीघ्र ही, इस स्थिति से विरत नहीं होते, तो हमारा नाश अवश्यम्भावी है, उसे कोई बचा नहीं सकता।
आश्चर्य तो यह है कि इस दयनीय स्थिति में भी, इन नये-नये आविष्कारों के होने से हमारी बुद्धि व्यामोह में इतनी फंस गई है कि हम उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों से अवगत नहीं हो पाते। हमें गर्व हो गया है कि हमने विश्व के इतिहास में यह अनोखा तीर मारा है। हमसे पहले की जनता कुछ नहीं जानती थी। हम अब सभ्य हैं और उत्तरोत्तर सभ्य होते जा रहे हैं। परन्तु वास्तव में यह सब मिथ्याहंकार है।
विश्व में दो प्रमुख मार्गों का अवलम्बन हमेशा से होता रहा है। एक है श्रेय मार्ग और दूसरा है प्रेय मार्ग। जो व्यक्ति श्रेय मार्ग का अवलम्बन करते हैं उन्हें दैवी सम्पदा से युक्त माना जाता है और जो प्रेय मार्ग का अनुसरण करते हैं, उन्हें दानवी या आसुरी सम्पदा से पूर्ण समझा जाता है। श्रेय मार्ग आत्मा का कल्याण करने वाला है। इससे विश्व में शान्ति, सुख एवं सौहार्द की भावना का विकास होता है एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विचारधारा जन-जन में व्याप्त होती है तथा प्रेय मार्ग जो कि दानवता को प्रश्रय देता है, विश्व में वैमनस्य, दुःख, द्वेष, फूट एवं होड़ का बीजारोपण करके मानव को तमोगुण से युक्त कर एक ऐसे वातावरण को प्रस्तुत करता है, जिससे समग्र विश्व में अशान्ति की स्थिति पैदा हो जाती है।
छान्दोग्य उपनिषद् में एक ऐसी ही भयावह स्थिति का वर्णन आता है, जिसमें कि प्रेय मार्ग से संसार मोहित हो गया था। दानव राक्षस या असुर शब्द का अर्थ लोग ऊटपटांग लगाते हैं। वास्तव में उनका शरीर, कोई मानव शरीर से भिन्न नहीं होता। एक ही मनुष्य, अपने कार्यों के कारण ही मानव और दानव होता है। भौतिकवाद का ऊलजलूल प्रयोग करने वाले ही राक्षस कहे जाते हैं और उसका उचित प्रयोग ही मानवता का लक्षण है। यन्त्रवाद का अतिशय प्रयोग, मानवता का शोषण कर रहा है। हमें उसका उन्हीं कार्यों में प्रयोग करना चाहिये जिन कार्यों को हम अपने हाथों से करने में असमर्थ हों।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि राम ने रावण का वध किया था। इस वध का कारण सीता जी का हरण नहीं था अपितु इसका कारण था रावण का अतिशय भौतिकवादी होना, इसीलिये उसे राक्षस कहा जाता था। अवतारी पुरुषों ने हमेशा भौतिकवाद के नाश के लिये ही अवतार लिया है। महाभारत युद्ध से पूर्व कृष्ण ने अपनी ओर के लोगों की शक्ति जाननी चाही। उस समय किसी ने कौरव सेना को तीन दिन में, किसी ने दो दिन में और किसी ने एक दिन में ही नष्ट करने के लिये कहा परन्तु घटोत्कच पुत्र बर्बरीक ने जो कि भीम के पौत्र थे, कहा कि वह एक पल में ही समस्त कौरव सेना को नष्ट कर सकता है। इतना सुनते ही कृष्ण ने चक्र से उसका गला काट लिया। यह थी भौतिकवादी शक्ति के प्रति उपेक्षा। घटोत्कच ने जो कि राक्षसी से उत्पन्न पुत्र था, महाभारत में आकाशीय युद्ध किया था। यही था उसके अन्दर का आसुरी गुण। ऐसे कार्य अधार्मिक माने जाते थे।
पूजनीय गांधी जी ने भी इस सत्य को समझा था, इसलिये वह भी यन्त्रवाद के अतिशय प्रयोग के विरोधी थे। चरखे का प्रयोग उनके इसी सिद्धान्त का साक्षी है। धर्म का वास्तविक रूप उन्होंने समझ लिया था। सभी महापुरुषों की विचारधारा में समानता होती है। धन का अनुचित केन्द्रीयकरण, फलतः वर्गवाद की उत्पत्ति, यन्त्रवाद के कारण ही हुई। इसीलिये यह राक्षसी कृत्य है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी योगिराज कृष्ण ने कहा है कि ‘‘अध्यात्म विद्या विद्यानाम’’ अर्थात् विश्व की सम्पूर्ण विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ। वास्तव में आत्मा एवं परमात्मा सम्बनधी ज्ञान प्राप्त करना ही सबसे कठिन कार्य है, इसीलिये यह विद्या सब विद्याओं में श्रेष्ठ है। जितना जितना भौतिकवाद बढ़ता जा रहा है हम उतने ही अपने बारे में ज्ञान शून्य होते जा रहे हैं। शान्ति खोकर अन्धकार में भटक रहे हैं।
ईश्वर एक महान योगी है, उसकी माया के जाल को समझना इन भौतिक तत्वों को जानकर सम्भव नहीं। उसकी सृष्टि का अन्त नहीं। उसके बारे में यदि विचार करना शुरु कर दिया जाय तो दिमाग खराब हो जायेगा। एक सौरमण्डल ही नहीं है। असंख्य सौरमण्डल हैं। कैसे नाप पाओगे उसके समग्र लोक! तुच्छ मानव! तुम व्यर्थ में ही अपना अर्थ, श्रम और समय नष्ट कर, केवल धूल ही पा सकोगे। इसमें कोई सन्देह नहीं। एकमात्र योग धर्म का पालन करके ही हम उस परम योगी परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार कर सकते हैं। और तभी यह सम्भव होगा कि हम उसके सकल ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझ सकें, जो कि उनकी योगमाया का परिणाम है। श्रेय मार्ग पर चलकर ही, धर्म के अनुकूल अर्थ अर्जन एवं काम का भोग करके मोक्ष प्राप्त कर सकोगे, सांसारिक रहस्यों को समझ सकोगे, अन्यथा नहीं।
अभी समय है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के वास्तविक रूप को जानकर, आत्म विश्वास, आत्म बल एवं आत्म संयम रूपी शस्त्रों को प्रयोग में लाकर अविद्या एवं अज्ञान का नाश करने में, अब भी समर्थ हो सकते हो।
श्रद्धा और विश्वास का सम्बल लेकर, मैंने इस ‘युग-व्यामोह’ नामक काव्य की रचना की है। अगर इस पथभ्रष्ट एवं भ्रमित विश्व को यह सुमार्ग पर डालने में समर्थ हुआ, तभी मेरा परिश्रम सफल होगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह काव्य जनमंगल करने में समर्थ होगा। एक मात्र इसी भावना से प्रेरित होकर, मैंने इस काव्य का प्रणयन किया है।
इसके अतिरिक्त यह कह देना भी आवश्यक है कि मैंने यह काव्य, पाण्डित्य प्रदर्शन के लिये नहीं लिखा है। मैंने रस, छन्द एवं अलंकारों का प्रयोग जानबूझकर नहीं किया है, जो स्वाभाविक रूप से आ गये हैं, आ गये हैं। समस्त विश्व के हित के लिये ही कहीं कहीं पर कटु भी होना पड़ा है। विश्व हित के लिये भ्रष्टाचार रूपी फोड़े को वाग्बाण रूपी शल्य चिकित्सा की ही आवश्यकता होती है। विद्वज्जन काव्य के दोषों पर ध्यान न देते हुए उसके अन्दर सन्निहित जन मंगल की भावना पर विचार करेंगे। यही मेरी प्रार्थना है।
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